IPO: ग्रे मार्केट प्रीमियम क्या होता है, कोस्तक रेट, सब्जेक्ट टु सौदा

IPO: ग्रे मार्केट प्रीमियम क्या होता है, ये हमको पता नहीं रहता लेकिन हम GMP को ट्रक करके आईपीओ मै अप्लाई करते है, और हमारे लगबग 90% आईपीओ मै आपको अच्छी लिस्टिंग देखने को मिलती है। 

आज के टाइम और आने वाले दिन मै, रोज नई -नई कंपनी के आईपीओ मार्केट मै आते हुये नजर आते है, इसका एनालिसिस करते टाइम हमको जीएमपी, कोस्तक रेट, सब्जेक्ट टु सौदा ये शब्ध सुनने को मिलते है, और उसी के आधार पर हम आईपीओ को अप्लाई करते है। 

तो आज हम IPO: ग्रे मार्केट प्रीमियम क्या होता है, ग्रे मार्केट क्या है, कैसे काम करता है, गे मार्केट कब ऑपरेट किया जाता है, कोस्तक (Kostak Rate) रेट क्या है।, सब्जेक्ट टू सौदा क्या है। इन सबके बारे मै हम डीटेल मै जानकारी लेंगे। 

IPO: ग्रे मार्केट प्रीमियम क्या होता है

ग्रे मार्केट क्या है, और यह कैसे काम करता है। (What is the gray market, and how does it work)

हमारे देश मे दो तरीकेके मार्केट रहते है, पहिला व्हाइट मार्केट और दूसरा ब्लॅक मार्केट।

व्हाइट मार्केट मै हम प्राइमरी और सेकेंडरी मार्केट मै शेयर की खरीदी और बिक्री करते है, और उसे SEBI के ध्वारा नियंत्रित किया जाता है। हम जो आईपीओ मै पैसा लगाके उसे डाइरैक्ट कंपनी के जरिये अप्लाई करते है उसे प्राइमरी मार्केट कहते है, और जब शेयर की लिस्टिंग होने के बाद उसे ब्रोकर के जरिये NSE और BSE मै खरीदते और बेचते है उसे सेकेंडरी मार्केट कहते है।

ब्लॅक मार्केट ये होता है की जहा पर अनधिकृत के जरिये बेचा ज्याता है, जैसे की ब्लॅक मै मूवी के टिकिट बेचे जाते है, जब कोविड आया था उसी टाइम कोरोना की दवाई ब्लॅक मै बेची जाती थी।

ग्रे मार्केट जो व्हाइट और ब्लॅक मार्केट के बीच का मार्केट है। ग्रे मार्केट गैरकानूनी नहीं है, और शायद उसे सेबी के नियम बनाए भी नहीं है।

ग्रे मार्केट मै ट्रेडिंग तो की जाती है, लेकिन उसमे सेबी के नियम लागू नहीं होते, क्योंकि सेबी के नियम आईपीओ की लिस्टिंग होने के बाद लागू होते है। यानी की ये गैरकानूनी मार्केट है, इसीलिए इसे हम ग्रे मार्केट कहते है।

ग्रे मार्केट कब ऑपरेट होता है। 

जब कोई आईपीओ मार्केट मै आता है, उसके के दौरान ग्रे मार्केट ऑपरेट होता है। यानी ही आईपीओ की तारिक की घोषणा होने के बाद आईपीओ के लिस्टिंग होने तक ग्रे मार्केट काम करता है।

10-12 दिन के टाइम तक ग्रे मार्केट एक्टिव रहता है।

ग्रे मार्केट में लोग ट्रेडिंग क्यो करते है। 

ग्रे मार्केट में लोग ट्रेड क्यो करते है, इसका हम एक उदाहरण से समजते है।

किसी एक कंपनी Zomato का आईपीओ आया, और लोंगों को लग रहा है, ये भौत ही फेमस कंपनी है, इसमे अच्छे प्राइस पर लिस्ट हो सकता है, कंपनी अच्छी है। तो उसी टाइम एक्स्ट्रा 10-30% देके उसके शेयर ब्लॉक किये जाते है।

100 रुपए का शेयर है तो 120 रुपए देके ब्लॉक किये जाते है, और ये 150 पर लिस्ट हो गया तो प्रति शेयर 30 रुपए का प्रॉफ़िट मिल सकता है।

इस वजह से ग्रे मार्केट मै ट्रेडिंग की जाती है। ये एक अनौपचारिक मार्केट है, और उसमे जो भी डील होती है, मुह से होती है, इसमे कोई रिटर्न अनुमति नहीं रहता।

IPO: ग्रे मार्केट प्रीमियम क्या होता है। (What is Grey Market Premium in IPO hindi)

ग्रे मार्केट प्रीमियम क्या है, उसे हम एक उधारण के जरिये समजते है।

एक कंपनी का आईपीओ मार्केट मै आया है, और उसका एक शेयर का इशू प्राइस है 1000 रुपये, और एक लॉट मै 15 शेयर है।

इसमे एक बंदा आता है, जो ब्रोकर और डीलर जैसे काम करता है, यो बंदा जो शेयर बेचेने वाला है सेल्लर उसके के पास जाके उसे हर शेयर का 1300 रुपये देने के लिए राजी है, यानी एक हर शेयर की 300 रूपये ज्यादा कीमत। वो ब्रोकर ऐसे बहुत सारे सेल्लर से बाते करके उनसे शेयर खरीदने की बात करता है।

लेकिन जो आईपीओ अच्छा है, उन सेल्लर को लगता है की इसकी प्राइस और ज्यादा लिस्टिंग हो सकती है, तो वो सेल्लर लोग ब्रोकर को  300 की बजाय 400 रूपये हर शेयर के पीछे मांगते है। इस तरह आईपीओ की कीमत काम ज्यादा होती है, उसे हम ग्रे मार्केट प्रीमियम कहते है।

ग्रे मार्केट प्रीमियम ये शेयर के issue प्राइस के कम भी हो सकता और ज्यादा भी होता है। कंपनी अच्छी रहेगी तो 1000 के इशू प्राइस मै लोग 1200 भी बेच सकते है और कंपनी खराब लगती है तो 1000 के इशू प्राइस मै 800 मे भी बेच सकते है।

कोस्तक (Kostak Rate) रेट क्या है।

ग्रे मार्केट प्रीमियम हर शेयर को लागू होता है, लेकिन कोस्तक रेट हर लॉट को लागू होता है। 

कोस्तक रेट क्या होता है इसे भी हम उधारण के जरिये समजते है। 

किसी कंपनी का आईपीओ आने के बाद ग्रे मार्केट मै बायर सेल्लर से 500 रूपये देके अपना अलॉट्मेंट बूक करता है, चाहे उसे अलॉट्मेंट मिले या न मिले। सेल्लर को तो 500 रूपये फिक्स मिलने वाले है। 

यानी की बायर उस सेल्लर से बोलता है की तुम्हें 500 रूपये फिक्स मिलेंगे ही, सेल्लर को अलॉट्मेंट मिला तो उसे शेयर या प्रॉफ़िट बायर को ट्रान्सफर करना होगा। नहीं मिला तो उसे 500 रूपये फिक्स मिलेंगे। 

इस तरह बायर ग्रे मार्केट मै बहुत सारे अलॉट्मेंट सेलर से बूक करता है। 

हमने एक उधारण से कोस्तक रेट क्या है, ये जाना। जो 500 रूपये की बात की उसे कोस्तक रेट बोलते है। कंपनी अच्छी है तो कोस्तक रेट ज्यादा रहता है, यानी की बायर सेल्लर से ज्यादा पैसे देके अलॉट्मेंट बूक करते है, और अच्छी नहीं है तो कम पैसे देते है। 

एक 15 हजार की अलॉट्मेंट है, तो बायर को 500 रूपये देके अलॉट्मेंट बूक करना पड़ता है। जब सेल्लर को अलॉट्मेंट मिलने के बाद सेल्लर को 20 हजार मे लिस्ट हो गए तो 20 हजार के शेयर या 50000 प्रॉफ़िट बायर को देना होगा। और 15 हजार की अलॉट्मेंट मै 10000 मे लिस्ट हो गये तो बायर को सेल्लर को 5000 नुकसान देना होगा। सेल्लर को अलॉट्मेंट मिला ही नहीं, तो बायर को 500 रूपये सेल्लर को देने ही पड़ेंगे। 

ये सब जितनी भी प्रोसैस होती है, ये एक ब्रोकर या डीलर के जरिये ग्रे मार्केट मै की जाती है। गे मार्केट मै डाइरैक्ट बायर और सेल्लर का कांटैक्ट नहीं रहता। 

सब्जेक्ट टु सौदा क्या है। 

सब्जेक्ट टू सौदा जानने के पहिले कोस्तक रेट क्या है, ये जानना जरूरी है, उसमे हमने एक एक्जाम्पल के जरिये कोस्तक रेट क्या हौ समाज था। 

कोस्तक रेट मै हमको फिक्स 500 रूपये सेल्लर को देने पड़ते थे, उसे अलॉट्मेंट मिले या न मिले, लेकिन सब्जेक्ट टु सौदा मै आपको अलॉट्मेंट मिलने के बाद ही पैसे देने पड़ेंगे। 

एक बार अपने सेल्लर से एप्लिकेशन बूक की और बाद मै आपको अलॉट्मेंट नहीं मिला तो सेल्लर को जो पैसे लिये है, उसे वापस करना पड़ता है। और यदि आपको अलॉट्मेंट मिला तो सेल्लर को तो जिथेने मै सौदा तय हुवा था, उतने पैसे मिलने वाले है, चाहे उसे फायदा हो या नुकसान, ये सब बायर के पास ट्रान्सफर होने वाला है। 

सब्जेक्ट टु सौदा लॉट के हिसाबसे ही काम करता है। और इसकी कीमत कंपनी किस तरह की है, उसी हिसाबसे काम ज्यादा होती रहती है। 

ग्रे मार्केट के नुकसान क्या है। (What are the disadvantages of gray market)

इसके पहिले हमने ग्रे मार्केट क्या है, ग्रे मार्केट प्रीमियम क्या है, इन सबके बारे मै जाना है, अब हम ग्रे मार्केट और ग्रे मार्केट प्रीमियम के नुकसान क्या है इसके बारे मै जान लेते है। 

1. ग्रे मार्केट ये एक अनधिकृत मार्केट है, यानी की इसे कंट्रोल करने वाला कोई नहीं है। 

2. ग्रे मार्केट मै कोई रिटर्न समझौता नहीं होता, जीतने भी समझौता होते है, ये सब ओरेल मे होते है। 

3. ग्रे मार्केट प्रीमियम की जो कीमत है, इसका कोई आधार नहीं है, जो डीलर बोल रहा है, वही हमको देना पड़ता है। 

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